वाल्मीकि रामायण 2.108.3
क: कस्य पुरुषो बन्धु: किमाप्यं कस्य केनचित् ।यदेको जायते जन्तुरेक एव विनश्यति॥
ka: kasya puruṣo bandhu: kimāpyaṃ kasya kenacit |yadeko jāyate jantureka eva vinaśyati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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