वाल्मीकि रामायण 2.109.22
भूमि: कीर्त्तिर्यशो लक्ष्मी: पुरुषं प्रार्थयन्ति हि ।स्वर्गस्थं चानुपश्यन्ति सत्यमेव भजेत तत्॥
bhūmi: kīrttiryaśo lakṣmī: puruṣaṃ prārthayanti hi |svargasthaṃ cānupaśyanti satyameva bhajeta tat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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