वाल्मीकि रामायण 2.117.15
सीता त्वेतद्वच: श्रुत्वा राघवस्य हितैषिण: ।तामत्रिपत्नीं धर्मज्ञामभिचक्राम मैथिली॥
sītā tvetadvaca: śrutvā rāghavasya hitaiṣiṇa: |tāmatripatnīṃ dharmajñāmabhicakrāma maithilī ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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