वाल्मीकि रामायण 2.118.15
उपपन्नं मनोज्ञं च वचनं तव मैथिलि ।प्रीता चास्म्युचितं किं ते करवाणि ब्रवीहि मे॥
upapannaṃ manojñaṃ ca vacanaṃ tava maithili |prītā cāsmyucitaṃ kiṃ te karavāṇi bravīhi me ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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