वाल्मीकि रामायण 2.12.2
किम् नु मे यदि वा स्वप्नश्चित्तमोहोओऽपि वामम ।अनुभूतोपसर्गो वा मनसो वाप्युपद्रवः॥
kim nu me yadi vā svapnaścittamohoo'pi vāmama |anubhūtopasargo vā manaso vāpyupadravaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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