वाल्मीकि रामायण 2.54.41
पुण्यश्च रमणीयश्च बहुमूलफलायुतः ।तत्र कुन्जर यूथानि मृग यूथानि च अभितः॥
puṇyaśca ramaṇīyaśca bahumūlaphalāyutaḥ |tatra kunjara yūthāni mṛga yūthāni ca abhitaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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