वाल्मीकि रामायण 2.63.3
सभार्ये निर्गते रामे कौसल्याम् कोसलेश्वरः ।विवक्षुरसितापाङ्गाम् स्मृवा दुष्कृतमात्मनः॥
sabhārye nirgate rāme kausalyām kosaleśvaraḥ |vivakṣurasitāpāṅgām smṛvā duṣkṛtamātmanaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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