वाल्मीकि रामायण 2.63.4
स राजा रजनीम् षष्ठीम् रामे प्रव्रजिते वनम् ।अर्ध रात्रे दशरथः सम्स्मरन् दुष्कृतम् कृतम्॥
sa rājā rajanīm ṣaṣṭhīm rāme pravrajite vanam |ardha rātre daśarathaḥ samsmaran duṣkṛtam kṛtam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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