वाल्मीकि रामायण 2.64.58
एवम् शापम् मयि न्यस्य विलप्य करुणम् बहु ।चितामारोप्य देहम् तन्मिथुनम् स्वर्गमभ्ययात्॥
evam śāpam mayi nyasya vilapya karuṇam bahu |citāmāropya deham tanmithunam svargamabhyayāt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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