वाल्मीकि रामायण 2.7.3
पताकाभिर्वरार्हाभिर्ध्वजैश्च समलङ्कृताम् ।वृतां चंदपथैश्चापि शिरःस्नातजनैर्वृताम्॥
patākābhirvarārhābhirdhvajaiśca samalaṅkṛtām |vṛtāṃ caṃdapathaiścāpi śiraḥsnātajanairvṛtām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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