वाल्मीकि रामायण 3.11.7
प्रसन्न सलिले रम्ये तस्मिन् सरसि शुश्रुवे ।गीत वादित्र निर्घोषो न तु कश्चन दृश्यते॥
prasanna salile ramye tasmin sarasi śuśruve |gīta vāditra nirghoṣo na tu kaścana dṛśyate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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