वाल्मीकि रामायण 3.42.5
प्रहृष्टः तु अभवत् तेन वचनेन स राक्षसः ।परिष्वज्य सुसंश्लिष्टम् इदम् वचनम् अब्रवीत्॥
prahṛṣṭaḥ tu abhavat tena vacanena sa rākṣasaḥ |pariṣvajya susaṃśliṣṭam idam vacanam abravīt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें