वाल्मीकि रामायण 3.50.25
किम् नु शक्यम् मया कर्तुम् गतौ दूरम् नृप आत्मजौ ।क्षिप्रम् त्वम् नश्यसे नीच तयोः भीतो न संशयः॥
kim nu śakyam mayā kartum gatau dūram nṛpa ātmajau |kṣipram tvam naśyase nīca tayoḥ bhīto na saṃśayaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें