वाल्मीकि रामायण 3.50.2
ततः पर्वत शृंग आभः तीक्ष्ण तुण्डः खग उत्तमः ।वनस्पति गतः श्रीमान् व्याजहार शुभाम् गिरम्॥
tataḥ parvata śṛṃga ābhaḥ tīkṣṇa tuṇḍaḥ khaga uttamaḥ |vanaspati gataḥ śrīmān vyājahāra śubhām giram ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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