वाल्मीकि रामायण 3.50.3
दशग्रीव स्थितो धर्मे पुराणे सत्य संश्रयः ।भ्रातः सः त्वम् निन्दितम् कर्म कर्तुम् न अर्हसि संप्रताम्॥
daśagrīva sthito dharme purāṇe satya saṃśrayaḥ |bhrātaḥ saḥ tvam ninditam karma kartum na arhasi saṃpratām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें