वाल्मीकि रामायण 4.12.2
स गृहीत्वा धनुर् घोरम् शरम् एकम् च मानदः ।सालम् उद्दिश्य चिक्षेप पूरयन् स रवैः दिशः॥
sa gṛhītvā dhanur ghoram śaram ekam ca mānadaḥ |sālam uddiśya cikṣepa pūrayan sa ravaiḥ diśaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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