वाल्मीकि रामायण 4.16.7
प्रति योत्स्यामि अहम् गत्वा सुग्रीवम् जहि संभ्रमम् ।दर्पम् च अस्य विनेष्यामि न च प्राणैर् वियोक्ष्यते॥
prati yotsyāmi aham gatvā sugrīvam jahi saṃbhramam |darpam ca asya vineṣyāmi na ca prāṇair viyokṣyate ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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