वाल्मीकि रामायण 4.17.2
स भूमौ न्यस्त सर्वांगः तप्त कांचन भूषणः ।अपतत् देव राजस्य मुक्त रश्मिर् इव ध्वजः॥
sa bhūmau nyasta sarvāṃgaḥ tapta kāṃcana bhūṣaṇaḥ |apatat deva rājasya mukta raśmir iva dhvajaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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