वाल्मीकि रामायण 4.18.5
अपृष्ट्वा बुद्धि संपन्नान् वृद्धान् आचार्य संमतान् ।सौम्य वानर चापल्यात् त्वम् माम् वक्तुम् इह इच्छसि॥
apṛṣṭvā buddhi saṃpannān vṛddhān ācārya saṃmatān |saumya vānara cāpalyāt tvam mām vaktum iha icchasi ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें