वाल्मीकि रामायण 4.19.2
अश्मभिः परिभिन्न अंगः पादपैर् आहतो भृशम् ।राम बाणेन च आक्रान्तो जीवित अंते मुमोह सः॥
aśmabhiḥ paribhinna aṃgaḥ pādapair āhato bhṛśam |rāma bāṇena ca ākrānto jīvita aṃte mumoha saḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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