वाल्मीकि रामायण 4.2.8
ते क्षिप्रम् अभिगम्य अथ यूथपा यूथपर्षभम् ।हरयो वानर श्रेष्ठम् परिवार्य उपतस्थिरे॥
te kṣipram abhigamya atha yūthapā yūthaparṣabham |harayo vānara śreṣṭham parivārya upatasthire ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें