वाल्मीकि रामायण 4.23.3
मत्तः प्रियतरा नूनम् वानरेन्द्र मही तव ।शेषे हि ताम् परिष्वज्य माम् च न प्रतिभाषसे॥
mattaḥ priyatarā nūnam vānarendra mahī tava |śeṣe hi tām pariṣvajya mām ca na pratibhāṣase ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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