वाल्मीकि रामायण 4.23.4
सुग्रीवस्य वशम् प्राप्तो विधिः एष भवत्य अहो ।सुग्रीव एव विक्रांतो वीर साहसिक प्रिय॥
sugrīvasya vaśam prāpto vidhiḥ eṣa bhavatya aho |sugrīva eva vikrāṃto vīra sāhasika priya ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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