वाल्मीकि रामायण 4.27.2
शार्दूल मृग संघुष्टम् सिंहैः भीम रवैः वृतम् ।नाना गुल्म लता गूढम् बहु पादप संकुलम्॥
śārdūla mṛga saṃghuṣṭam siṃhaiḥ bhīma ravaiḥ vṛtam |nānā gulma latā gūḍham bahu pādapa saṃkulam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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