वाल्मीकि रामायण 4.31.3
मति क्षयात् ग्राम्य सुखेषु सक्तःतव प्रसाद अप्रतिकार बुद्धिः ।हतो अग्रजम् पश्यतु वालिनम्न राज्यम् एवम् विगुणस्य देयम्॥
mati kṣayāt grāmya sukheṣu saktaḥtava prasāda apratikāra buddhiḥ |hato agrajam paśyatu vālinamna rājyam evam viguṇasya deyam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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