वाल्मीकि रामायण 4.31.4
न धारये कोपम् उदीर्ण वेगम्निहन्मि सुग्रीवम् असत्यम् अद्य ।हरि प्रवीरैः सह वालि पुत्रोनरेन्द्र पुत्र्या विचयम् करोतु॥
na dhāraye kopam udīrṇa vegamnihanmi sugrīvam asatyam adya |hari pravīraiḥ saha vāli putronarendra putryā vicayam karotu ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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