वाल्मीकि रामायण 4.42.13
वेलातल निवेष्टेषु पर्वतेषु वनेषु च ।मुरची पत्तनम् चैव रम्यम् चैव जटा पुरम्॥
velātala niveṣṭeṣu parvateṣu vaneṣu ca |muracī pattanam caiva ramyam caiva jaṭā puram ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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