वाल्मीकि रामायण 4.50.10
जल आर्द्राः चक्रवाकाः च रक्त अंगाः पद्म रेणुभिः ।ततः तत् बिलम् आसाद्य सुगन्धि दुरतिक्रमम्॥
jala ārdrāḥ cakravākāḥ ca rakta aṃgāḥ padma reṇubhiḥ |tataḥ tat bilam āsādya sugandhi duratikramam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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