वाल्मीकि रामायण 4.60.14
अथ पश्यमि दूरस्थम् ऋषिम् ज्वलित तेजसम् ।कृत अभिषेकम् दुर्धर्षम् उपावृत्तम् उदन् मुखम्॥
atha paśyami dūrastham ṛṣim jvalita tejasam |kṛta abhiṣekam durdharṣam upāvṛttam udan mukham ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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