वाल्मीकि रामायण 4.60.4
अस्य विन्ध्यस्य शिखरे पतितो अस्मि पुरा अनघ ।सूर्य ताप परीत अंगो निर्दग्धः सूर्य रश्मिभिः॥
asya vindhyasya śikhare patito asmi purā anagha |sūrya tāpa parīta aṃgo nirdagdhaḥ sūrya raśmibhiḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
पुस्तक में खोलें