वाल्मीकि रामायण 5.1.7
स तस्य गिरिवर्यस्य तले नागवरायुते ।तिष्ठन् कपिवरस्तत्र ह्रदे नाग इवाबभौ॥
sa tasya girivaryasya tale nāgavarāyute |tiṣṭhan kapivarastatra hrade nāga ivābabhau ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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