वाल्मीकि रामायण 5.1.72
मेरुमन्दरसंकाशानुद्धतान् स महार्णवे ।अत्यक्रामन्महावेगस्तरङ्गान् गणयन्निव॥
merumandarasaṃkāśānuddhatān sa mahārṇave |atyakrāmanmahāvegastaraṅgān gaṇayanniva ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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