वाल्मीकि रामायण 5.13.42
चिताम् कृत्वा प्रवेक्ष्यामि समिद्धम् अरणी सुतम् ।उपविष्टस्य वा सम्यग् लिन्गिनम् साधयिष्यतः॥
citām kṛtvā pravekṣyāmi samiddham araṇī sutam |upaviṣṭasya vā samyag linginam sādhayiṣyataḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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