वाल्मीकि रामायण 5.18.4
विबुध्य तु यथाकालम् राक्षसेन्द्रः प्रतापवान् ।स्रस्तमाल्याम्बरधरो वैदेहीमन्वचिन्तयात्॥
vibudhya tu yathākālam rākṣasendraḥ pratāpavān |srastamālyāmbaradharo vaidehīmanvacintayāt ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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