वाल्मीकि रामायण 5.2.24
संपूर्णां राक्षसैर्घोरैर्नागैर्भोगवतीमिव ।अचिन्त्यां सुकृतां स्पष्टां कुबेराध्युषितां पुरा॥
saṃpūrṇāṃ rākṣasairghorairnāgairbhogavatīmiva |acintyāṃ sukṛtāṃ spaṣṭāṃ kuberādhyuṣitāṃ purā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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