वाल्मीकि रामायण 5.2.4
शतान्यहं योजनानां क्रमेयं सुबहुन्यपि ।किं पुनः सागरस्यान्तं संख्यातं शतयोजनम्॥
śatānyahaṃ yojanānāṃ krameyaṃ subahunyapi |kiṃ punaḥ sāgarasyāntaṃ saṃkhyātaṃ śatayojanam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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