वाल्मीकि रामायण 5.30.2
अवेक्षमाणस्तां देवीं देवतामिव नन्दने ।ततो बहुविधां चिन्तां चिन्तयामास वानरः॥
avekṣamāṇastāṃ devīṃ devatāmiva nandane |tato bahuvidhāṃ cintāṃ cintayāmāsa vānaraḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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