वाल्मीकि रामायण 5.30.33
विमृशंश्च न पश्यामि यो हते मयि वानरः ।शतयोजनविस्तीर्णं लङ्गयेत महोदधिम्॥
vimṛśaṃśca na paśyāmi yo hate mayi vānaraḥ |śatayojanavistīrṇaṃ laṅgayeta mahodadhim ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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