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वाल्मीकि रामायण 5.32.3
मैथिली चिन्तयामास विस्मयं परमं गता ।अहो भीममिदं रूपं वानरस्य दुरासदम् ।दुर्निरीक्ष्यमिति ज्ञात्वा पुनरेव मुमोह सा॥
maithilī cintayāmāsa vismayaṃ paramaṃ gatā |aho bhīmamidaṃ rūpaṃ vānarasya durāsadam |durnirīkṣyamiti jñātvā punareva mumoha sā ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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