वाल्मीकि रामायण 5.36.8
शतयोजनविस्तीर्णः सागरो मकरालयः ।विक्रमश्लाघनीयेन क्रमता गोष्पदीकृतः॥
śatayojanavistīrṇaḥ sāgaro makarālayaḥ |vikramaślāghanīyena kramatā goṣpadīkṛtaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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