वाल्मीकि रामायण 5.38.3
स्त्रीत्वं न तु समर्थं हि सागरं व्यतिवर्तितुम् ।मामधिष्ठाय विस्तीर्णं शतयोजनमायतम्॥
strītvaṃ na tu samarthaṃ hi sāgaraṃ vyativartitum |māmadhiṣṭhāya vistīrṇaṃ śatayojanamāyatam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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