वाल्मीकि रामायण 5.38.4
द्वितीयं कारणं यच्च ब्रवीषि विनयान्विते ।रामादन्यस्य नार्हामि संस्पर्शमिति जानकि॥
dvitīyaṃ kāraṇaṃ yacca bravīṣi vinayānvite |rāmādanyasya nārhāmi saṃsparśamiti jānaki ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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