वाल्मीकि रामायण 5.39.14
क्षिप्रमेष्यति काकुत्स्थो हर्यृक्षप्रवरैर्वृतः ।यस्ते युधि विजित्यारीन् शोकं व्यपनयिष्यति॥
kṣiprameṣyati kākutstho haryṛkṣapravarairvṛtaḥ |yaste yudhi vijityārīn śokaṃ vyapanayiṣyati ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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