वाल्मीकि रामायण 5.43.2
चैत्यप्रासादमाप्लुत्य मेरुशृङ्गमिवोन्नतम् ।आरुरोह हरिश्रेष्ठो हनुमान् मारुतात्मजः॥
caityaprāsādamāplutya meruśṛṅgamivonnatam |āruroha hariśreṣṭho hanumān mārutātmajaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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