वाल्मीकि रामायण 5.43.3
आरुह्य गिरिसङ्काशं प्रासादं हरियूथपः ।बभौ स सुमहातेजाः प्रतिसूर्य इवोदितः॥
āruhya girisaṅkāśaṃ prāsādaṃ hariyūthapaḥ |babhau sa sumahātejāḥ pratisūrya ivoditaḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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