वाल्मीकि रामायण 5.43.4
संप्रधृष्य च दुर्धर्षं चैत्यप्रासादमुत्तमम् ।हनुमान् प्रज्वलन् लक्ष्म्या पारियात्रोपमो ऽभवत्॥
saṃpradhṛṣya ca durdharṣaṃ caityaprāsādamuttamam |hanumān prajvalan lakṣmyā pāriyātropamo 'bhavat ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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