वाल्मीकि रामायण 5.46.5
यत्तैश्च खलु भाव्यं स्यात्तमासाद्य वनालयम् ।कर्म चापि समाधेयं देशकालविरोधिनम्॥
yattaiśca khalu bhāvyaṃ syāttamāsādya vanālayam |karma cāpi samādheyaṃ deśakālavirodhinam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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