वाल्मीकि रामायण 5.46.8
तैरवश्यं विधातव्यं व्यलीकं किंचिदेव नः ।तदेव नात्र सन्देहः प्रसह्य परिगृह्यताम्॥
tairavaśyaṃ vidhātavyaṃ vyalīkaṃ kiṃcideva naḥ |tadeva nātra sandehaḥ prasahya parigṛhyatām ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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