वाल्मीकि रामायण 5.55.33
दग्धेयं नगरी सर्वा साट्टप्राकारतोरणा ।जानकी न च दग्धेति विस्मयो ऽद्भुत एव नः॥
dagdheyaṃ nagarī sarvā sāṭṭaprākāratoraṇā |jānakī na ca dagdheti vismayo 'dbhuta eva naḥ ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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