वाल्मीकि रामायण 5.55.8
धिगस्तु मां सुदुर्बुद्धिं निर्लज्जं पापकृत्तमम् ।अचिन्तयित्वा तां सीतामग्निदं स्वामिघातकम्॥
dhigastu māṃ sudurbuddhiṃ nirlajjaṃ pāpakṛttamam |acintayitvā tāṃ sītāmagnidaṃ svāmighātakam ||
इस श्लोक का हमारा सरल अर्थ विद्वत् समीक्षा की प्रतीक्षा में है।
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